नई दिल्ली:(द दस्तक 24 न्यूज़) 18 अगस्त 2025 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से तिरंगा फहराने के बाद अपने संबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को देश का सबसे बड़ा NGO बताया। लेकिन क्या यह बयान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, तिरंगे और संविधान के इतिहास के साथ न्याय करता है? इस सवाल ने एक बार फिर से राष्ट्रीय राजनीति में बहस को जन्म दे दिया है।
★RSS का गठन और स्वतंत्रता संग्राम से दूरी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी।
लेकिन इतिहास गवाह है कि 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन जैसे ऐतिहासिक आंदोलनों से RSS ने दूरी बनाए रखी। स्वतंत्रता संग्राम में जब पूरा देश आंदोलनकारी था, तब RSS की भूमिका पर सवाल उठते रहे।
इतिहासकारों और स्वतंत्रता सेनानियों के बयान साफ़ कहते हैं कि RSS ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय योगदान नहीं दिया। यही नहीं, RSS पर महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध भी लगाया गया था।
★गांधी हत्या और सरदार पटेल का बैन
30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब नाथूराम गोडसे का नाम सामने आया, तो यह साफ हुआ कि गोडसे RSS का पूर्व सदस्य रह चुका था।
भारत के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने RSS पर बैन लगाया और सरकार ने इसे सीधे तौर पर जिम्मेदार माना। हालांकि बाद में कानूनी तकनीकी आधार पर यह प्रतिबंध हटा लिया गया।
★तिरंगे और संविधान का विरोध
सन 1950 में RSS कार्यकर्ताओं द्वारा तिरंगा जलाने की घटना दर्ज है।
2001 तक RSS ने अपने कार्यालयों में तिरंगा नहीं फहराया।
संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर का भी RSS ने विरोध किया और कई बार पुतले जलाए गए।
आरक्षण का विरोध भी RSS के इतिहास का हिस्सा रहा है।
★RSS और आरक्षण विरोध
आरक्षण लागू होने के बाद से ही RSS लगातार इसे ‘विभाजनकारी नीति’ कहकर विरोध करता रहा।
1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू करने वाले प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह और उनके सहयोगी नेताओं—शरद यादव, देवी लाल, रामविलास पासवान, लालू प्रसाद यादव, कांशीराम और मुलायम सिंह यादव—के खिलाफ RSS और उसके सहयोगी संगठन सड़कों पर थे।
आज भी खुले तौर पर न सही, लेकिन भीतर ही भीतर आरक्षण को लेकर संघ के विरोध की आवाज़ें सुनाई देती हैं।
★RSS का जातीय ढांचा – ब्राह्मण वर्चस्व
संघ की शीर्ष नेतृत्व संरचना पर नज़र डालें तो पिछले 100 साल में इसके केवल 6 सरसंघचालक हुए हैं—
1. डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार
2. माधव सदाशिव गोलवलकर
3. बालासाहेब देवरस
4. राजेंद्र सिंह (ठाकुर)
5. कुप्पहली सीतारामैया सुदर्शन
6. मोहन भागवत
इनमें से 5 ब्राह्मण और 1 ठाकुर रहे हैं। यह भी आलोचना का विषय रहा है कि संघ में नेतृत्व जातीय रूप से एकतरफ़ा रहा है।
★आजादी के नायकों से विरोध
RSS और उसके विचारकों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाले महानायक—भगत सिंह, नेहरू, पटेल, गांधी और चंद्रशेखर आज़ाद—के विचारों का हमेशा विरोध किया।
आजादी के बाद भी मंडल राजनीति के नायकों और दलित-पिछड़े वर्गों के नेताओं के खिलाफ RSS खड़ा रहा।
★मोदी का बयान और सवाल
अब सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री मोदी ने RSS को देश का सबसे बड़ा NGO कहकर क्या इतिहास को अनदेखा किया है?
क्या यह वही संगठन नहीं है जिसने आजादी के आंदोलन से दूरी बनाई?
क्या यह वही संगठन नहीं है जिसने तिरंगे और संविधान का विरोध किया?
क्या यह वही संगठन नहीं है जिसने बाबा साहब अंबेडकर और आरक्षण समर्थकों के खिलाफ खुला विरोध किया?
★निष्कर्ष
RSS ने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से समाज में पकड़ बनाई है। लेकिन जब इसे “देश का सबसे बड़ा NGO” कहा जाता है, तो सवाल उठना लाज़मी है कि—
क्या किसी जाति विशेष के वर्चस्व को बढ़ावा देना ही राष्ट्रसेवा है?
क्या आजादी के नायकों का विरोध करने वाला संगठन वास्तव में देश का सबसे बड़ा NGO कहलाने योग्य है?
या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह बयान किसी दबाव या राजनीतिक रणनीति के तहत दिया है?
इतिहास और वर्तमान के बीच यह बहस जारी है—RSS राष्ट्रनिर्माण की धारा में सहयोगी रहा है या विरोधी, यह फैसला आने वाली पीढ़ियां करेंगी।
