Monday, 14 September 2026 | 6:17 PM
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बिहार चुनाव : बिहार में पलायन चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता?

बिहार में पलायन चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में जिस राज्‍य से लोग सबसे ज्‍यादा पलायन करते हैं, वो बिहार है. इसकी सबसे बड़ी वजह रोजगार का न होना है. लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में पलायन 'चुनावी मुद्दा' नहीं बन पाया है. 'जन सुराज पार्टी' के प्रशांत किशोर ने इसपर
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बिहार चुनाव : बिहार में पलायन चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता?
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बिहार में पलायन चुनावी मुद्दा क्यों नहीं बनता है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत में जिस राज्‍य से लोग सबसे ज्‍यादा पलायन करते हैं, वो बिहार है. इसकी सबसे बड़ी वजह रोजगार का न होना है. लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव में पलायन 'चुनावी मुद्दा' नहीं बन पाया है. 'जन सुराज पार्टी' के प्रशांत किशोर ने इसपर आवाज़ उठाई, लेकिन बहुत प्रैक्टिकल एप्रोच नहीं होने के कारण उतना असर नहीं किया, जितना होना चाहिए. बीच में वो न जाने किस कारण से थोड़े मौन भी हो गए. पिछले 75 वर्षों से सत्ता भोग रहे राजनेता इस मुद्दे पर सवाल क्यों उठायेंगे? कारण स्पष्ट है कि उंगली उनके तरफ़ मुड़ेगी, तो बड़ी आसानी और सावधानी से लगभग सभी दल के राजनेता इस पलायन के विषय पर मौन ही नहीं होते हैं, बल्कि सावधानी से समस्त विषय को बिहार में सरकारी नौकरी का प्रलोभन, धर्म, जाति और न जाने कितने अन्य कारकों की तरफ़ जनता को ठेल देते हैं.

ख़बर है कि सिर्फ़ मुजफ्फरपुर आने के लिए इस छठ पूजा में क़रीब 12.90 लाख टिकट काटे गए रेलवे द्वारा. पटना का आंकड़ा 23 लाख से ऊपर है और क़रीब 50% लोग वापस बिहार दिल्ली रूट से आ रहे हैं. यह आंकड़ा मैं नहीं लिख रहा, बल्कि बिहार के अख़बारों में छपा है. इधर दिल्ली बिहार के बढ़िया हाईवे बनने के बाद मेरा अनुमान है की करीब 1 लाख कारें बिहार में सिर्फ़ उत्तर भारत से प्रवेश करेंगी. ये वो मिडिल क्लास हैं, जो कुछ वर्ष बिहार से बाहर रह अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत किए हैं. मैंने छठ के मौके पर गुजरात तक से कारें आते अपने गांव में देखी हैं.

बिहार के प्रमुख शहरों के आसपास के गांव में पलायन की प्रतिशत कम है, लेकिन ज़िला मुख्यालय से दूर वाले गांव में कोई चारा नहीं रहने के कारण कई टोले तो पूर्णतः शून्य है. लेकिन यह स्थिति पटना के अपर मिडिल क्लास में भी ज़्यादा है. सन 2018/19 में नीतीश कुमार ने स्वयं एक भाषण में कहा की बिहार के बड़े शहरों में पुरानी पीढ़ी ने बड़े-बड़े मकान बनाए, लेकिन अब उसी बड़े हालात में उनकी नई पीढ़ी रहने को तैयार नहीं है.